हिन्दी निबन्ध
निबंध का स्वरूप
निबंध को लेख भी कहा जाता है। गद्य साहित्य में निबंध को एक स्वतंत्र और
सर्वश्रेष्ठ विधा के रूप में अपनाया गया है। इसमें लेखक अपने विचारों का प्रतिपादन
युक्ती और तर्कों के आधार पर करता है । रामचंद्र शुक्ल के अनुसार
- "गद्य रचना यदी कवियों की कसौटी है, तो निबंध गद्य की कसौटी है।" किसी लेखक का
भाषा पर कितना अधिकार है, यह निबंध
के द्वारा ही जाना जा सकता है। निबंध रचयिता के व्यक्तित्व का परिचायक है ।
निबंध शब्द की व्युत्पती ‘नि’ उपसर्ग
पूर्व बंध धातु या शब्दांश से मानी जाती है। ‘नि’ का अर्थ
है- विशेष प्रकार से, भली-भांती
या उचित ढंग से, तो ‘बंध’ का अर्थ
है – बांधना। अर्थात
विचारों को विशेष ढंग से, विशेष
दृष्टी से प्रस्तुत करना। अत: निबंध में
विचारों का एक कसावपूर्ण तारतम्य होना चाहिये। साथ ही सुसंगठण और सुबद्धता
भी।
संस्कृत साहित्य परंपरा में भी इस शब्द को देखा जा सकता है। पर वर्तमान प्रचलित
निबंध अंग्रेजी के Essay, फ्रांसीसी
'एसेइस' का पर्यायवाची है। जहां इसका अर्थ प्रयास, प्रयोग, परीक्षण
है। यूरोपियन साहित्य में निबंध का जनक मोंटेन (1533 - 1592)को माना गया
है। इनका प्रथम निबन्ध संग्रह 1580 में प्रकाशित हुआ था।
निबंध की
परिभाषा
वास्तव में निबंध ऐसी विचार प्रधान रचना है, जिसमें तर्कसंगत भाषा-शैली से विषय का
निरूपण किया जाता है। इसकी कुछ परिभाषाएं निम्न अनुसार है -
मोंटेन – इच्छित विषय के
निरूपण के प्रयास का नाम निबंध है।
बेकन – विच्छिन्न चिंतन
को लिखित रूप में निबंध कहते है।
जॉन्सन – निबंध स्वच्छंद
मन की वह तरंग है, जिसमें
नैरतर्य या सुसंगठन न होकर प्रधानतया विशृंखलता ही रहती है।
ओस्बर्न - निबंध किसी सामयिक विषय पर लिखी गई सामान्य रचना
है।
बाबू गुलाबराय - ‘‘निबंध उस
गद्य-रचना को कहते हैं, जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या
प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छंदता, सौष्ठव और सजीवता तथा आवश्यक संगति और
सम्बद्धता के साथ किया गया हो।’’
आचार्य शुक्ल -’’यदि गद्य कवियों को
कसौटी है, तो निबंध गद्य की।’’
पं.श्यामसुंदर दास-’’निबंध वह लेख है
जिसमें किसी गहन विषय पर विस्तारपूर्वक और पाण्डित्यपूर्व ढंग से विचार किया गया
हो।’’
सीताराम चतुर्वेदी - साधारणतः निबंध वह साहित्य रूप
है जो न बहुत बड़ा हो, न बहुत छोटा, जो गद्यात्मक हो।
इस प्रकार निबंध किसी विषय पर विचार प्रगट करने
की कला है। इसमें विचारों को क्रमबद्ध रूप में पिरोया जाता है। इसमें ज्ञान विचार
और व्यक्तित्व का अद्भुत संगम होता है। यद्यपि निबंध लिखने का कोई निश्चित सूत्र
नहीं है।
निबंध
के प्रकार
निबंध के प्रकार के हैं-
1. वर्णनात्मक निबंध
2. विवरणात्मक निबंध
3. भावात्मक निबंध
4. साहित्यिक या आलोनात्मक
निबंध
1.
वर्णनात्मक निबंध -
इन निबन्धों में निरूपण अथवा व्याख्या की
प्रधानता रहती है। विभिन्न प्रकार के दृश्यों, घटनाओं तथा स्थलों का आकर्षक वर्णन
करना ही इन निबन्धों का कलेवर - विषयवस्तु होता है। इन निबन्धों की अन्य विशेषता
यह है कि- यहाँ प्राय: प्रत्येक निबंधकार अपने निबंध में एक सजीव-चित्र उपस्थित
करता है। तीर्थ, यात्रा, नगर, दृश्य-वर्णन, पर्व-त्यौहार, मेले-तमाशे,
दर्शनीय-स्थल आदि का मनोरम एवं संश्लिष्ट वर्णन करना ही निबंधकार का प्रमुख
उद्देश्य होता है। इनमें लेखक प्रकृति और मानव-जगत् में से किसी से भी विषय चयन कर
सर्वसाधारण के लिए निबंध-रचना करता है।
2.
विवरणात्मक निबंध -
विवरणात्मक-निबन्धों में कल्पना एवं अनुभव की
प्रधानता होती है। साथ ही इस वर्ग के निबन्धों में वर्णन के साथ-साथ विवरण की
प्रवृत्ति भी विद्यमान रहती है। इन्हें कथात्मक अथवा आख्यानात्मक निबंध भी कहा
जाता है। विवरणात्मक-निबन्धों की विषयवस्तु मुख्यत: जीवनी, कथाएँ, घटनाएँ,
पुरातत्त्व, इतिहास, अन्वेषण, आखेट, युद्ध आदि विषयों पर आधृत होती है। ये निबंध
‘व्यास-शैली’ में लिखे जाते हैं।
3.
भावात्मक निबंध -
भावात्मक-निबन्धों में बुद्धि की अपेक्षा
रागवृत्ति की प्रधानता रहती है। इनका सीधा सम्बन्ध ‘हृदय’ से होता है। अनुभूति,
मनोवेग अथवा भावों की अतिशय अभिव्यंजना इन निबन्धों में द्रष्टव्य है। इन निबन्धों
में निबंधकार सहृदयता, ममता, प्रेम, करुणा, दया आदि भावनाओं से युक्त व्यवहार को
प्रकट करता है।
4.
साहित्यिक या आलोनात्मक निबंध-
किसी साहित्यकार, साहित्यिक विधा या साहित्यिक
प्रवृत्ति पर लिखा गया निबंध साहित्यिक या आलोचनात्मक निबंध कहलाता है, जैसे मुंशी
प्रेमचंद, तुलसीदास, आधुनिक हिन्दी कविता, छायावाद हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग
आदि। इसमें ललित निबंध भी आते हैं। इनकी भाषा काव्यात्मक और रसात्मक होती है। ऐसे
निबंध शोध पत्र के रूप में अधिक लिखे जाते हैं।
निबन्ध का महत्व
सारी दुनिया की भाषाओं
में निबंध को साहित्य की सृजनात्मक विधा के रूप में मान्यता आधुनिक युग में ही
मिली है। आधुनिक युग में ही मध्ययुगीन धार्मिक, सामाजिक रूढ़ियों से मुक्ति का
द्वार दिखाई पड़ा है। इस मुक्ति में निबंध का
महत्व गहरा है।
हजारीप्रसाद
द्विवेदी के अनुसार-
"नए
युग में जिन नवीन ढंग के निबंधों का प्रचलन हुआ है वे व्यक्ति की स्वाधीन चिन्ता
की उपज है।"
इस प्रकार निबंध में
निबंधकार की स्वच्छंदता का विशेष महत्त्व है।
1)
निबन्ध चिन्तन प्रधान होता है। इसलिए व्यक्ति की सोच को बदलने में इसका बहुत बड़ा
महत्व रहता है।
2)
निबन्ध सामाजिक दायित्व को निर्वाह करनेवाला होता है। समाजसुधार में निबन्ध का
महत्व प्रमुख होता है।
3)
निबन्ध पूर्णतः सृजनात्मक विधा है। अतः साहित्य को समृद्ध कतने में महत्वपूर्ण
भूमिका का निर्वाह करता है।
4)
निबन्ध सीमित आकार का होता है। अतः आम जनता में लोकप्रिय है। चेतना को प्रभावित
करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
5) निबन्ध ज्ञानवर्धक होता है। निबन्ध के द्वारा लोगों में परखने की दृष्टि पैदा होती है।
हिन्दी निबन्धों का विकस क्रम
हिंदी गद्य का अभाव तो भारतेंदुजी से पूर्व भी नहीं था, पर कुछ अपवादों तक सीमित
था। उसकी न तो कोई निश्चित परंपरा थी और न ही प्रधानता। सन् 1850 के बाद गद्य की
निश्चित परंपरा स्थापित हुई, महत्त्व भी बढ़ा। पाश्चात्य सभ्यता के संपर्क में आने
पर हिंदी साहित्य भी निबंध की ओर उन्मुख हुआ। इसीलिए कहा जाता है कि भारतेंदु युग
में सबसे अधिक सफलता निबंध लेखन में मिली। हिंदी निंबध साहित्य को निम्नलिखित
भागों में विभाजित किया जा सकता है
- भारतेंदुयुगीन निबंध,
- द्विवेदीयुगीन निबंध,
- शुक्लयुगीन निबंध
- शुक्लयुगोत्तर निबंध
भारतेंदुयुगीन निबंध-भारतेंदु युग में सबसे
अधिक सफलता निबंध में प्राप्त हुई। इस युग के लेखकों ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के
माध्यम से निबंध साहित्य को संपन्न किया! भारतेंदु हरिश्चंद्र से हिंदी निबंध का
आरंभ माना जाना चाहिए। बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र ने इस गद्य विधा को
विकसित एवं समृद्ध किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन दोनों लेखकों को स्टील और
एडीसन कहा है। ये दोनों हिंदी के आत्म-व्यंजक निबंधकार थे। इस युग के प्रमुख
निबंधकार हैं-भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बदरीनारायण
चौधरी ‘प्रेमघन’, लाला श्री निवासदास, राधाचरण गोस्वामी, काशीनाथ खत्री आदि। इन
सभी निबंधकारों का संबंध किसी-न-किसी पत्र-पत्रिका से था। भारतेंदु ने पुरातत्त्व,
इतिहास, धर्म, कला, समाज-सुधार, जीवनी, यात्रा-वृत्तांत, भाषा तथा साहित्य आदि
अनेक विषयों पर निबंध लिखे। प्रतापनारायण मिश्र के लिए तो विषय की कोई सीमा ही
नहीं थी। ‘धोखा’, ‘खुशामद’, ‘आप’, ‘दाँत’, ‘बात’ आदि पर उन्होंने अत्यंत रोचक
निबंध लिखे। बालकृष्ण भट्ट भारतेंदु युग के सर्वाधिक समर्थ निबंधकार हैं। उन्होंने
सामयिक विषय जैसे ‘बाल-विवाह’, ‘स्त्रियाँ और उनकी शिक्षा’ पर उपयोगी निबंध लिखे।
‘प्रेमघन’ के निबंध भी सामयिक विषयों पर टिप्पणी के रूप में हैं। अन्य निबंधकारों
का महत्त्व इसी में है कि उन्होंने भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र
के मार्ग का अनुसरण किया।
द्विवेदीयुगीन निबंध-भारतेंदु युग में निबंध
साहित्य की पूर्णतः स्थापना हो गई थी, लेकिन निबंधों का विषय अधिकांशतः
व्यक्तिव्यंजक था। द्विवेदीयुगीन निबंधों में व्यक्तिव्यंजक निबंध कम लिखे गए। इस
युग के श्रेष्ठ निबंधकारों में महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938), गोविंदनारायण
मिश्र (1859-1926), बालमुकुंद गुप्त (1865-1907), माधव प्रसाद मिश्र (1871-1907),
मिश्र बंधु-श्याम बिहारी मिश्र (1873-1947) और शुकदेव बिहारी मिश्र (1878-1951),
सरदार पूर्णसिंह (1881-1939), चंद्रधर शर्मा गुलेरी (1883-1920), जगन्नाथ प्रसाद
चतुर्वेदी (1875-1939), श्यामसुंदर दास (1875-1945), पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’
(1876-1932), रामचंद्र शुक्ल (1884-1940), कृष्ण बिहारी मिश्र (1890-1963) आदि
उल्लेखनीय हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध परिचयात्मक या आलोचनात्मक हैं।
उनमें आत्मव्यंजन तत्त्व नहीं है। गोंविद नारायण मिश्र के निबंध पांडित्यपूर्ण तथा
संस्कृतनिष्ठ गद्यशैली के लिए प्रसिद्ध हैं। बालमुकुंद गुप्त ‘शिवशंभु के चिट्टे’
के लिए विख्यात हैं।ये चिट्ठे “भारत मित्र’ में छपे थे। माधव प्रसाद मिश्र के
निबंध ‘सुदर्शन’ में प्रकाशित हुए। उनके निबंधों का संग्रह ‘माधव मिश्र निबंध
माला’ के नाम से प्रकाशित है। सरदार पूर्णसिंह भी इस युग के निबंधकार हैं। इनके
निबंध नैतिक विषयों पर हैं। कहीं-कहीं इनकी शैली व्याख्यानात्मक हो गई हैं।
चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने कहानी के अतिरिक्त निबंध भी लिखे। उनके निबंधों में
मार्मिक व्यंग्य है। जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी के निबंध ‘गद्यमाला’ (1909) और
‘निबंध-निलय’ में प्रकाशित हैं। पद्मसिंह शर्मा कमलेश तुलनात्मक आलोचना के लिए
विख्यात हैं। उनकी शैली प्रशंसात्मक और प्रभावपूर्ण है। श्यामसुंदरदास तथा कृष्ण
बिहारी मिश्र मूलतः आलोचक थे। इनकी शैली सहज और परिमार्जित है। आचार्य रामचंद्र
शुक्ल के प्रारंभिक निबंधों में भाषा संबंधी प्रश्नों और कुछ ऐतिहासिक व्यक्तियों
के संबंध में विचार व्यक्त किए गए हैं। उन्होंने कुछ अंग्रेजी निबंधों का अनुवाद
भी किया।इस युग में गणेशशंकर विद्यार्थी, मन्नन द्विवेदी आदि ने भी पाठकों का
ध्यान आकर्षित किया।
शुक्लयुगीन निबंध-इस युग के प्रमुख
निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं आचार्य शुक्ल के निबंध ‘चिंतामणि’ के दोनों
खंडों में संकलित हैं। अभी हाल में चिंतामणि का तीसरा खंड प्रकाशित हुआ है। इसका
संपादन डॉ. नामवर सिंह ने किया है। इसी युग के निबंधकारों में बाबू गुलाबराय
(1888-1963) का उल्लेखनीय स्थान है। ‘ठलुआ क्लब’, ‘फिर निराश क्यों’, ‘मेरी
असफलताएँ’ आदि संग्रहों में उनके श्रेष्ठ निबंध संकलित हैं।लाला पुन्नालाल बख्शी’
ने कई अच्छे निबंध लिखे। इनके निबंध ‘पंचपात्र’ में संगृहीत हैं। अन्य निबंधकारों
में शांति प्रिय द्विवेदी, शिवपूजन सहाय, पांडेय बेचन शर्मा
‘उग्र’, रधुवीर सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी आदि मुख्य हैं। इस युग में निबंध तो लिखे
गए, पर ललित निबंध कम ही हैं।
शुक्लयुगोत्तर निबंध-शुक्लयुगोत्तर काल में
निबंध ने अनेक दिशाओं में सफलता प्राप्त की। इस युग में समीक्षात्मक निबंध
अधिक लिखे गए। यों व्यक्तिव्यंजक निबंध भी कम नहीं लिखे गए। शुक्लजी के
समीक्षात्मक निबंधों की परंपरा के दूसरे नाम हैं नंददुलारे वाजपेयी।
इसी काल के महत्त्वपूर्ण निबंधकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
हैं। उनके ललित निबंधों में नवीन जीवन-बोध है।शुक्लयुगोत्तर निबंधकारों में
जैनेंद्र कुमार का स्थान काफी ऊँचा है। उनके निबंधों में दार्शनिकता है। यह
दार्शनिकता निजी है, अतः ऊब पैदा नहीं करती। उनके निबंधों में सरसता है।
हिंदी में प्रभावशाली
समीक्षा के अग्रदूत शांतिप्रिय द्विवेदी हैं। इन्होंने समीक्षात्मक निबंध भी लिखे
हैं और साहित्येतर भी। ।रामधारीसिंह ‘दिनकर’ ने भी इस युग में
महत्त्वपूर्ण निबंध लिखे। इनके निबंध विचार-प्रधान हैं। लेकिन कुछ निबंधों में
उनका अंतरंग पक्ष भी उद्घाटित हुआ है। समीक्षात्मक निबंधकारों में डॉ. नगेंद्र का
स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनके निबंधों की कल्पना, मनोवैज्ञानिक दृष्टि उनके
व्यक्तित्व के अपरिहार्य अंग हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी के निबंध-संग्रह ‘गेहूँ और
गुलाब’ तथा ‘वंदे वाणी विनायकौ’ हैं। बेनीपुरी की भाषा में आवेग है, जटिलता नही
है। यशपाल के निबंधों में
भी मार्क्सवादी दृष्टिकोण मिलता है । प्रभाकर माचवे, विद्यानिवास मिश्र, धर्मवीर
भारती, शिवप्रसाद सिंह, कुबेरनाथ राय, ठाकुर प्रसाद सिन्हा आदि के ललित निबंध
विख्यात हैं।सामयिक निबंधों में नई चिंतन पद्धति और अभिव्यक्ति देखी जा सकती है।
अज्ञेय, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय, निर्मल वर्मा, रमेशचंद्रशाह, शरद जोशी,
जानकी वल्लभ शास्त्री, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, नेमिचंद्र जैन, विष्णु प्रभाकर,
जगदीश चतुर्वेदी, डॉ. नामवर सिंह और विवेकी राय आदि ने हिंदी गद्य की निबंध परंपरा
को न केवल बढ़ाया है, बल्कि उसमें विशिष्ट प्रयोग किए हैं। समीक्षात्मक निबंधों
में गजानन माधव मुक्तिबोध का नाम आता है। उनके निबंधों में बौद्धिकता है और वयस्क
वैचारिकता का बोध है।उनके निबन्ध संग्रह ‘नई
कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध’ नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, ‘समीक्षा की
समस्याएँ’ और ‘एक साहित्यिक की डायरी’ नामक निबंध विशेष उल्लेखनीय हैं। डॉ.
रामविलास शर्मा के निबंध शैली में स्वच्छता, प्रखरता तथा वैचारिक संपन्नता है।
हिंदी निबंध में व्यंग्य को रवींद्र कालिया ने बढ़ाया है। नए निबंधकारों में
रमेशचंद्र शाह का नाम तेजी से उभरा है।महादेवी वर्मा, विजयेंद्र स्नातक, धर्मवीर
भारती, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के निबंधों में प्रौढ़ता
है। इसके अतिरिक्त विष्णु प्रभाकर कृत ‘हम जिनके ऋणी हैं’ जानकी वल्लभ शास्त्री
कृत ‘मन की बात’, ‘जो बिक न सकी’ आदि निबंधों में क्लासिकल संवेदना का उदात्त रूप
मिलता है। नए निबंधकारों में : प्रभाकर श्रोत्रिय, चंद्रकांत वांदिवडेकर, नंदकिशोर
आचार्य, बनवारी, कृष्णदत्त पालीवाल, प्रदीप मांडव, कर्णसिंह चौहान और सुधीश पचौरी
आदि प्रमुख हैं। आज राजनीतिक-सांस्कृतिक विषयों पर भी निबंध लिखे जा रहे हैं। अतः
हिंदी निबंध-साहित्य उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है।




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