Paper- 5.2, Unit- 1, कहानी
कहानी की सीमा संक्षिप्त होती है। इसलिए पात्र भी संक्षिप्त होंगे। पात्रों के माध्यम से जीवन के खंड चित्रों को उजागर किया जाता है। कभी वर्णनात्मक प्रणाली में कहानीकार चरित्रों का चित्रण करता है, तो कभी पात्रों के व्यवहार, संवाद उन्हें स्वयं व्यक्त करते है। चरित्र चित्रण की कोई भी प्रणाली क्यों न हो, पात्र आवश्यक होते है।
3. संवाद
कथ्य, कथानक और पात्रों में विश्वसनीयता और गतिशीलता लाने के लिए संवादों की योजना होती है। चारित्रिक गुणों को रूपायित करनेवाले और वातावरण को अंकित करनेवाले संवाद ही योग्य माने जाएंगे।
4. वातावरण
कथ्य, कथानक और पात्रों की सत्यता देशकाल-वातावरण में उन्हें और ज्यादा विश्वसनीय बना देती है। कहानी के सभी पात्र योग्य वातावरण में ही सजीव होते है।
5. भाषाशैली
कहानी सुबोधगम्य बने इसलिए कहानी की भाषा सरल चाहिए। जहां तक अभिव्यक्ति का प्रश्न है, शैली संप्रेषनशील और प्रभावी चाहिए। ताकि पाठकों को लेखक का मंतव्य ज्ञात हो और मनोरंजन मिले।
6. उद्देश्य
कहानी का मूल प्रेरणा बिंदू उद्देश्य कहलाता है। उदृदेश्य के रूप में कहानीकार कुछ भी अपना सकता है। समाज की किसी कुरीति, रूढी, व्यक्ति की समस्या, जीवन समाज का व्यापक प्रश्न आदि भी कहानी के केंद्रबिंदू बन सकते है। उद्देश्य के अभाव में कहानी कहानी नहीं बन सकती। उद्देश्य के रूप में कहानी में संप्रेषन की क्षमता चाहिए। मानवीय मूल्यों को उजागर करना ही कहानी का उद्देश्य हो और उनकी रक्षा काने की प्रेरणा देना उनका संदेश हो।
हिन्दी कहानी का उद्भव और
विकास
संस्कृत का कथा-साहित्य अखिल विश्व के कथा-साहित्य का जन्मदाता माना जाता है, परन्तु आधुनिक हिन्दी कहानी का विकास संस्कृत-कथा-साहित्य की परम्परा में न होकर, पाश्चात्य साहित्य विशेषतया अँग्रेज़ी साहित्य के प्रभाव रूप में हुआ।
उपन्यासों की
भाँति कहानियों की रचना का प्रारम्भ भी भारतेन्दु युग से हुआ। यद्यपि आलोचकों ने
ब्रजभाषा में लिखी गयी भक्त कवियों की कथा-दो सौ बावन, वैष्णवों की
वार्ता तथा दो सौ चौरासी वैष्णवों की वार्ता को आधुनिक हिन्दी कहानी का प्रारम्भ
मानता है, परन्तु कहानी के तत्वों को दृष्टि में रखते हुए यह
मान्यता उपयुक्त नहीं है। इसके बाद कुछ आलोचकों ने हिन्दी के प्रारम्भिक गद्यकारों- सदासुखलाल के सुखसागर, लल्लूलाल के प्रेमसागर, सदलमिश्र के
नासिकेतोपाख्यान तथा इंशाअल्ला खाँ की रानी केतकी की कहानी को हिन्दी की
प्रारम्भिक कथा-कृतियाँ माना
है, परन्तु आधुनिक
कहानियों के तत्वों, विषयों और
विचारधाराओं को देखते हुए यह मत भी उपयुक्त नहीं दिखायी पड़ता। आधुनिक युग में
विकसित कहानी-कला का जन्म भी
भारतेन्दुयुग से ही मानना उपयुक्त होगा। हिन्दी-कहानी के सम्पूर्ण विकास को चार युगों में बाँटा जा
सकता है-(1) भारतेन्दुयुग, (2) द्विवेदीयुग, (3) प्रसाद व
प्रेमचन्दयुग, (4) वर्तमान युग।
भारतेन्दयुग-
भारतेन्दु
द्वारा लिखित "एक अद्भुत
अपूर्व स्वप्न" को इस युग की
पहली कहानी माना जा सकता है। यद्यपि कहानी कला की दृष्टि से यह अपरिपक्व हैं फिर
भी इसमें कहानी जैसी रोचकता है। इस युग के दूसरे कहानीकार गौरीदत्त शर्मा हैं।
इनकी "कहानी-टका कमानी" और "देवरानी जेठानी
की कहानी" उपदेश प्रधान
कहानियाँ हैं।
द्विवेदीयुग-
इस युग में
कहानी-कला के विकास
में सबसे बड़ा योगदान "सरस्वती" पत्रिका का है। इसमें प्रकाशित होने वाली प्रथम कहानी
किशोरीलाल गोस्वामी की "इन्दुमती"(1900 ई.) है। उस पर
शेक्सपियर के नाटक "टेम्पेस्ट" का प्रभाव है। बंग-मंहिला (राजेन्द्रबाला घोष) नाम से बंगला
की कई अनूदित कहानियाँ सरस्वती में प्रकाशित हुई। इस युग की मौलिक कहानियों में
मास्टर भगवानदास की प्लेग की "चुड़ैल"(1902 ई.), रामचन्द्र
शुक्ल की "ग्यारह वर्ष" का समय(1903 ई.), गिरजादत्त
बाजपेयी की "पंडित और
पंडितानी" तथा बंग-महिला की "दुलाईवाली"(1907 ई.) विशेष उल्लेखनीय हैं। प्रेमचन्द की भी कई कहानियाँ सरस्वती में छपीं।
प्रसाद व प्रेमचन्दयुग-
प्रसाद और
प्रेमचन्द ने हिन्दी-कहानी-कला को उसके विकास के उच्च शिखर पर अधिष्ठित किया।
प्रसाद की प्रारम्भिक कहानी ग्राम "इन्दु" नामक पत्रिका
में प्रकाशित हुई। छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी, बिसाती, इन्द्रजाल, मधुवा, पुरस्कार, गुण्डा आदि प्रसाद जी की उत्कृष्ट कहानियाँ हैं।
प्रसाद जी प्रेमचन्द से पहले कहानीक्षेत्र में आये। इनके हाथों हिन्दी-कहानी को गम्भीर कलात्मक भाषा और उत्कृष्ट विषयों की
प्राप्ति हुई।
उपन्यासों की
भाँति हिन्दी कहानी का चरम उत्कर्ष भी मुंशी प्रेमचन्द के हाथों हुआ। इन्होंने
लगभग तीन सौ कहानियाँ लिखकर हिन्दी कहानी कला को समृद्ध बनाया। उपन्यासों की भाँति
इनकी तत्कालीन जन-जीवन विशेषतया
ग्रामीण-जीवन का सजीव
चित्रण मिलता है। अपनी पुस्तक "हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास" में आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी प्रेमचंद के विषय में कहते हैं- "प्रेमचंद उन लेखको में हैं जिन्होंने अपने रचनाभिमान
को सबसे ऊपर रखा। किसी प्रकार के आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक दबाव
को उन्होंने कभी नहीं माना। प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अध्यक्ष पद से बोलते हुए (1936) उन्होंने अपनी
दो टूक शैली में कहा था, "वह (साहित्यकार) देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।"
प्रारम्भ में
इनकी कहानियों के संग्रह "सप्तसरोज", "नवनिधि", "प्रेमपचीसी", "प्रेमपूर्णिमा", "प्रेमद्वादशी", "प्रेमतीर्थ", "सप्तसुमन", आदि नामों से प्रकाशित हुए थे। बाद में मानसरोवर नाम
के आठ संग्रह खण्डों में इनकी सभी कहानियाँ प्रकाशित हुई है। प्रेमचन्द की
उल्लेखनीय कहानियों में इनकी प्रथम कहानी पंचपरमेश्वर, आत्माराम, बड़े घर की बेटी, शतरंज के
खिलाड़ी, बज्रपात, रानीसारंधा, ईदगाह, बूढ़ी काकी, पूस की रात, सुजान भगत, कफन, पंडित मोटेराम, मुक्तिपथ आदि हैं। इन्होंने अपनी कहानियों में उत्तर भारत के विभिन्न वर्गीय
जनजीवन को चित्रित किया है।
प्रेमचन्द की
कहानियों की भाषा-शैली अत्यन्त
सरल है। इनकी कहानियाँ इनके उपन्यासों का ही लघु संस्करण कही जा सकती हैं।
प्रेमचन्द के
बाद हिन्दी कहानी कला के उत्कर्ष में चन्द्रधर शर्मा "गुलेरी" का योगदान चिरस्मणीय है। इन्होंने अपनी तीन कहानियों- "उसने कहा था", "सुखमय जीवन", "बुद्धू का काँटा" से ही जितनी
कीर्ति अर्जित कर ली, उतनी दर्जनों
कहानियाँ लिखकर भी अन्य कहानीकार न कर सके। इनकी "उसने कहा था" कहानी हिन्दी की श्रेष्ठतम कहानियों में से एक है। वही इनकी कीर्ति का अक्षय
स्तम्भ भी है।
"गुलेरी" जी के बाद कहानी-क्षेत्रः में
विश्वम्भर नाथ कौशिक का नाम उल्लेखनीय है। इनकी "वह प्रतिभा" और "ताई" कहानियाँ अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। इस युग के अन्य
प्रतिष्ठित कहानीकारों में पं. बद्रीनाथ भट्ट, सुदर्शन, (कमल की बेटी, कवि की स्त्री, संसार की सबसे
बड़ी कहानी) पाण्डेय बेचन
शर्मा "उग्र" (उसकी बेटी, सनकी, अमीर, जल्लाद) आचार्य चतुरसेन शास्त्री (दुखवा कासो कहूँ मोरी सजनी, भिक्षुराज, दही की हाँड़ी, दे खुदा की राह पर) आदि हैं।
वर्तमान युग-
जैनेन्द्र जी
से हिन्दी कहानियों का वर्तमान युग प्रारम्भ होता है। बदली हुई प्रवृत्तियों के
अनुरूप इस युग की कहानियाँ भी अपने आप में एक नयापन लिये हुए हैं। जैनेन्द्र की
तमाशा, पत्नी, घुँघुरू, ब्याह, भाभी, परदेशी, चलचित्र, कः पन्थः आदि
कहानियों में बदले हुए युग की दार्शनिक गम्भीरता, बौद्धिकता तथा सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विवेचन आदि के स्पष्ट दर्शन होते है।
जैनेन्द्रजी के साथ ही ज्वाला दत्त शर्मा की भाग्यचक्र, अनाथ बालिका आदि कहानियाँ उल्लेखनीय हैं। तचण्डीप्रसाद
ह्दयेश, गोविन्द वल्लभ
पन्त, सियाराम शरण
गुप्त, वृन्दावन लाल
वर्मा आदि इसी खेमे के कहानीकार हैं।
इसके बाद ही
हिन्दी में मनोविश्लेषणपरक कहानियों की परम्परा चली। इस दृष्टि से इलाचन्द्र जोशी
की कहानियों तथा भगवती प्रसाद वाजपेयी की मिठाई वाला, झांकी, त्याग, वंशीवादन आदि
कहानियों में मनोवैज्ञानिक तथ्यों का उद्घाटन प्रमुख है। "अज्ञेय" की कहानियाँ भी फ्रायड के मनोविश्लेषण वाद से प्रभावित है। विपथगा, परम्परा, कोठरी की बात, जयदोल इनके
प्रमुख कहानी-संग्रह है।
वर्तमान कहानी
कला के क्षेत्र में उपेन्द्रनाथ "अश्क" का महत्वपूर्ण
स्थान है। इनकी कहानियों में निहित तीखे सामाजिक व्यंग्य द्रष्टव्य है। प्रेमचन्द
की भाँति इनकी कहानियाँ भी विस्तृत जनजीवन से सम्बन्धित हैं। पिंजरा, पाषाण, मोती, दूला, मरूस्थल, गोखरू, खिलौने, चट्टान, जादूगरनी, चित्रकार की
मौत, हलाल का टुकड़ा, कुछ न समझ सका, पराया-सुख, ज्ञानदान, बदनाम, जबरदस्ती आदि
इनकी प्रसिद्ध कहानियाँ हैं। इसी समय के आसपास चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, जी.पी. श्रीवास्तव, हरिशंकर शर्मा, कृष्णदेव गौड़, बेढब बनारसी, जयनाथ नलिन आदि ने भी अपनी कहानियों के द्वारा हिन्दी
कहानी कला को समृद्ध बनाया है।
वर्तमान समय में कहानी एक सर्वप्रसिद्ध साहित्यिक विधा है। आजकल
की साहित्यिक पत्रिकाओं- सारिका, कादम्बिनी, नयी कहानी, हिन्दुस्तान, धर्मयुग, कथादेश, अन्यथा, कथाक्रम, अपेक्षा, तहलका, परिचय, वसुधा, पहल, लमही तथा अन्यानेक पत्रिकाओं में आये दिन कहानियाँ
प्रकाशित होती रहती हैं। सन् साठ के बाद की कहनियों में इस युग की दौड़-धूप भरी ज़िन्दगी के किसी एक निश्चित पहलू या क्षण की
कथा समाहित रहती है। युग की बौद्धिकता और सूक्ष्मचिन्तन की प्रवृत्ति के अनुरूप ही
कहानियाँ भी दिन प्रतिदिन सूक्ष्म और बौद्धिक होती जा रही हैं। इनमें
प्रतीकात्मकता को विशेष प्रश्रय दिया जा रहा है। कहानियों की कोई निश्चित दिशा भी
नहीं हैं। कहानीकार किसी भी घटना या अनुभूति के किसी भी क्षण को लेकर, संवेदनात्मक स्तर पर चित्रित करने के लिए सर्वथा
स्वच्छन्द है। पहले की कहानियों की भाँति वर्तमान कहानियों में न तो पात्रों की
बहुलता होती है और न ही घटनाओं की। कथावस्तु की सूक्ष्मता और प्रतीकात्मकता की
दृष्टि से आये दिन कहानियों की दिशा में नवीन प्रयोग होते देखे जा रहे हैं।
वर्तमान कहानीकला नयी कहानियों से भी आगे बढ़कर अकहानी की पदवी पाने को लालायित है।
नयी कविता या अकविता की भाँति कहानी भी वर्तमान साहित्यिक प्रयोगों का बहुत बड़ा
माध्यम है। वर्तमान कहानी की तुलना "स्नैपशाट" से की जाती है।
कुल मिलाकर नयी कविता की भाँति नयी कहानी भी दिन प्रतिदिन सूक्ष्मता ग्रहण करती
प्रयोगधर्मा बन गयी है।
वर्तमान
कहानीकारों की गणना कर पाना एक सर्वथा असम्भव कार्य है क्योंकि आये-दिन पत्र-पत्रिकाओं में नये-नये कहानीकारों
की कहानियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। इस युग के कुछ प्रसिद्ध कहानीकारों के नाम
हैं - देवेन्द्र
सत्यार्थी, रांगेय राघव, प्रभाकर माचवे, अंचल, मुक्तिबोध, रेणु, मार्कण्डेय, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, दूधनाथसिंह, शैलेश मटियानी, अमृतराय, नीलकान्त, सुरेशसिंह, अमर गोस्वामी, काशीनाथ सिंह, रवीन्द्र
कालिया, निर्मल वर्मा, संजीव, शिवमूर्ति, अरुण प्रकाश, स्वयं प्रकाश, सृंजय, उदयप्रकाश, कैलाश बनवासी, अखिलेश, पंकज मित्र, मो. आरिफ, देवेन्द्र आदि।
महिला कहानीकारों में सत्यवती मलिक, महादेवी वर्मा, चन्द्रप्रभा, तारा पाण्डेय, चन्द्रकिरण सौनरिक्सा, रामेश्वरी
शर्मा, शकुन्तला माथुर, शिवानी, निर्मला ठाकुर, ममता कालिया, कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, अलका सरावगी, मेहरून्निसा परवेज, गीतांजलिश्री, नीलाक्षी सिंह
तथा मनीषा कुलश्रेष्ठ विशेषतया उल्लेखनीय हैं।





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